THE EMPTY HEART

Periasamy Thooran

 

Summary In English

 

Periasamy Thoran was a renowned Tamil writer. He was born in the year 1908 and lived upto the age of eighty one. He died in the year 1987. General Encyclopedia in in Tamil in ten volumes. The encyclopedia was edited by Periasamy. After the Publication of general Encyclopedia he compiled and edited another encyclopedia in Tamil for children.

In writing poem Thoran preferred prose – poem and sonnet [ poem of fourteen lines ]. His works include [ Illtatamized’ and ‘ Kavitaika’ which are collection of poems, which is a short story book and collection of essays entitled pubin Sirippu. He was honoured with the prestigious award of Padma Bhushan by the government of sudia and ‘ Kalalmamani ‘ from Tamilnadu Govt.

In this poem the poet has painted the picture of a man who was rich but was not satisfied with what he had. Throughout the day, noon and night he would be thinking of only money and money . He would goto the ‘ Wish- Yielding Tree ‘ and pray to grant him a pot of gold.

One day the God granted him his wish and bestowed with seven pitchers of gold coin. All the seven pitchers were filled upto the neek . The wish God had the last laugh on him and he gave him the eighth pitcher too but this pitcher was only half filled.

The rich man after getting the eighth pitcher became sad. He forgot about the other seven full vessels. The demon of desire entered into his made him mad.

This desire over took his good reasonsing and he totally neglected his mother, wife and children. He started working till mind after getting up before sunrise and avoided taking meal, breakfast and everything. He because shameless to catch a coin through any method. Ultimately he died one day but he could not at a fulfil his desire. He could not manage to fill the pot.

At the end the poet says that greed of a man is endless but the life is not. The end to life is found to come. It is not all wrong if we have limited money with us.

It is only the void in our heart which is killing . Man is never satisfied and that is the curse in life.

 

कविता का सारांश

प्रेरियासामी योरन एक विख्यात तमिल लेखक थे। उनका जन्म सन् 1908 में हुआ था और वे 81 वर्ष तक जीवित रहे । वर्ष 1987 में उनकी मृत्यु हो गयी। एक कहानीकार के रूप में उनको ख्याति मिली और फिर एक कवि के रूप में भी उनको प्रसिद्धि मिली । पर तमिल भाषा मैं उनके द्वारा संकलित और संपादित विश्वकोश के प्रकाशन के बाद उनकी ख्याति में चार चांद लग गये। बाद में उन्होंने बाल — विश्वकोश का भी संपादन किया ।

उन्होंने अपनी कविता की शैली गद्यकाव्य की रखी। सोलह पंक्ति की छंद रचना को भी उन्होंने अपनी कविता लेखन का माध्यम बताया ।उनकी प्रसिद्ध काव्य कृतियां है — इलन्तामिजा ‘ , ‘कविताइका ‘ । ‘ तंगकागलि’ शीर्षक ने से उनकी कहानियों का संग्रह प्रकाशित हुआ और निबंध- संग्रह का प्रकाशन ‘ पुविन स्क्रिप्स’ नाम से हुआ ।

भारत सरकार की ओर से उन्हें ‘पदम भूषण’ की उपाधि देकर अलंकृत किया गया और ‘कलालमणि ‘का सम्मान उन्हें तमिलनाडु सरकार द्वारा प्रदान किया गया ।

प्रस्तुत कविता जिसका अंग्रेजी शीर्षक है — मानव की कमजोरियों पर प्रकाश डालता है। तमिल में इस कविता का शीर्षक ‘ कुराईकदम ‘। धन के प्रति मनुष्य जरूरत से ज्यादा आकर्षित रहता है। धन -संग्रह की आकांक्षा मनुष्य की एक बहुत बड़ी कमजोरी है । जैसे-जैसे जीवन में धन का आगमन होता है मनुष्य की लालसा ,लिप्सा ,धन -प्राप्ति के लिए और तेज होती जाती है और यही उनकी मृत्यु का कारण बन जाती है ।

खाली आत्मा है या या कविता एक ऐसे मनुष्य का चित्र प्रस्तुत करता है जिसके पास धन की कमी नहीं है लेकिन संतुष्टि नहीं है ।दिन ,दोपहर ,रात वह केवल धन प्राप्ति के बारे में ही सोचता रहता है — उसे लगता है उसे धन मिले। वह कल्पतरु के पास जाकर प्रार्थना करता उसे कम से कम एक घर सोना मिल जाए कल्पतरु एक ऐसा तरु यानी माना जाता है जो लोगों के मन की इच्छा की पूर्ति करता है। एक दिन ‘कल्पतरु ‘उसकी प्रार्थना सुन ली और उसे की जगह सात घड़े सोने के सिक्का का वरदान दिया । सभी सातों घड़े बिल्कुल सोने के सिक्के से भरे हुए थे। मनोकामना पूर्ति करने वाले स्वर्ण उस व्यक्ति की परीक्षा लेनी चाहिए और उसे एक और अतिरिक्त घड़ा भी दिया जिसमें सोने के सिक्के तो थे लेकिन यह आठवां घड़ आधा खाली था।

यह आठवाँ घड़ा पाकर वह धनी व्यक्ति परेशान होने की जगह उदास हो गया ।उसके मन में पुन : एक कामना ने जन्म लिया —यह अठवाँ घड़ा ईश्वर ने आधा खाली क्यों दिया? वह साथ पूर्ण घरे के बारे में भूल गया और आठ में घरे की पूर्णता का ख्याल उसके हृदय में खरीदने लगा ।उसकी या इच्छा इतनी बलवती हुई कि वह अपना मानसिक संतुलन खो बैठा । दिन रात एक ही चिंता उसके मन में मस्तिष्क में हिलोरें मारती रहीं — वह अपनी माँ, पत्नी और बच्चों को भी भूल गया ।वह रात- दिन भी जी तोड़ मेहनत करने लगा ।वह सूर्योदय के पूर्व मुर्गे की आवाज भी नहीं सुनाई पड़ती उठ जाता और मध्य रात तक काम करता रहता। वह खाना-पीना ,नाश्ता सब भूल गया ।रात को उसे ठीक से नींद भी नहीं आती थी । सही दिशा में सोचने का कार्यक्रम उसने बिलकुल छोड़ दिया था यानी सद्बुद्धि क्या उसे त्याग कर दिया था ।धन कमाने के लिए उसने चतुराई और दौड़ता का सहारा लेना शुरू किया । पैसा कमाने हेतु वह किसी प्रकार का हथकंडा अपना सकता था ।

पर उसकी चतुराई भी किसी काम की नहीं आई और अपने अनवरत प्रयत्न के बाद भी वह उस घरे को ऊपर तक पढ़ नहीं पाया और दुर्भाग्यवश वह मर गया।

अंत कवि अन्त में कहता है कि मनुष्य की इच्छाएँ अनंत है उसके अंदर का लोभ मरता नहीं पर मृत्यु का अंत निश्चित है ।मनुष्य के पास अगर सीमित धन भी हो तो जीवन यापन में कोई बाधा नहीं आती। हममें अपराध बोध का भाव नहीं आना चाहिए अगर हमारे बटुए में कम पैसे हैं । असंतोष हमारे हृदय में एक खालीपन की अग्नि प्रज्वलित कर देता है जो अग्नि जल्दी बुझती नहीं और वही मनुष्य के लिए ‘ मारक’ बन जाती है।

 

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