स्वामी दयानन्दः आधुनिकभारते समाजस्य शिक्षायाश्च महान् उद्धारकः स्वामी दयानन्दः। आर्यसमाजनामकसंस्थायाः संस्थापनेन एतस्य प्रभूतं योगदानं भारतीयसमाजे गृह्यते। भारतवर्षे राष्ट्रीयतायाः बोधोऽपि अस्य कार्यविशेषः। समाजे अनेकाः दूषिताः प्रथा खण्डयित्वा शुद्धतत्त्वज्ञानस्य प्रचारं दयानन्दः अकरोत्। अयं पाठः स्वामिनो दयानन्दस्य परिचयं तस्य समाजोद्धरणे योगदानं च निरूपयति।

अर्थ – आधुनिक भारत में समाज और शिक्षा के महान उद्धारक स्वामी दयानन्द हैं। आर्यसमाज नामक संस्था की स्थापना करने में इनका बहुत बड़ा योगदान भारतीय समाज में लिया जाता है। भारत वर्ष में राष्ट्रीयता का ज्ञान कराना भी इनका कार्य-विशेष माना जाता है। समाज में अनेक दूषित प्रथाओं को खण्डित कर वास्तविकता का ज्ञान का प्रचार दयानन्द ने किया। यह पाठ स्वामी दयानन्द के परिचय और समाज उद्धार में उनका योगदान को स्पष्ट किया है।

 

मध्यकाले नाना कुत्सितरीतयः भारतीयं समाजम् अदूषयन्। जातिवादकृतं वैषम्यम्, अस्पृश्यता, धर्मकार्येषु आडम्बरः, स्त्रीणामशिक्षा, विधवानां गर्हिता स्थितिः, शिक्षायाः अव्यापकता इत्यादयः दोषाः प्राचीनसमाजे आसन्। अतः अनेके दलिताः हिन्दुसमाजं तिरस्कृत्य धर्मान्तरणं स्वीकृतवन्तः।

अर्थ – मध्य काल में अनेक गलत रीति-रिवाजों से भारतीय समाज दूषित हो गया था। जातिवाद से किया गया विषमता, छुआ-छूत, धर्म कार्यों में आडम्बर, स्त्रियों की अशिक्षा, विधवाओं की निन्दनीय स्थिति, शिक्षा की कमी इत्यादि अनेक दोष समाज में थे। अतः अनेक दलित हिन्दू समाज अपमानित होकर धर्म परिवर्तन करना स्वीकार लिया।

 

एतादृशे विषमे काले ऊनविंशशतके केचन धर्मोद्धारकाः सत्यान्वेषिणः समाजस्य वैषम्यनिवारकाः भारते वर्षे प्रादुरभवन्। तेषु नूनं स्वामी दयानन्दः विचाराणां व्यापकत्वात् समाजोद्धरणस्य संकल्पाच्च शिखर-स्थानीयः।

अर्थ – इस प्रकार के विषम समय में उन्नसवीं सदी में कुछ धर्म उद्धारक, सत्य की खोज करने वाले तथा समाज की विषमता को दूर करने वाले भारतवर्ष में उत्पन्न हुए। उनमें अवश्य स्वामी दयानन्द के विचारों का व्यापक प्रभाव तथा समाज-उद्धार के संकल्प से उनका स्थान सर्वोच्च है।

 

स्वामिनः जन्म गुजरातप्रदेशस्य टंकरानामके ग्रामे 1824 ईस्वी वर्षेऽभूत्। बालकस्य नाम मूलशंकरः इति कृतम्। संस्कृतशिक्षया एवाध्ययनस्यास्य प्रारम्भो जातः। कर्मकाण्डिपरिवारे तादृश्येव व्यवस्था तदानीमासीत्। शिवोपासके परिवारे मूलशंकरस्य कृते शिवरात्रिमहापर्व उद्बोधकं जातम्।

अर्थ – स्वामी जी का जन्म गुजरात प्रदेश के ‘टंकरा‘ नामक गाँव में 18240 हुआ था। बालक का नाम ‘मूलशंकर‘ रखा गया। संस्कृत शिक्षा से ही अध्ययन प्राप्त हुआ। उस समय कर्मकाण्डी परिवार में एसी ही व्यवस्था थी। शिव के उपासक परिवार में शिवरात्रि महापर्व मूलशंकर के लिए प्रेरक सिद्ध हुआ।

 

रात्रिजागरणकाले मूलशंकरेण दृष्टं यत् शंकरस्य विग्रहमारुह्य मूषकाः विग्रहार्पितानि द्रव्याणि भक्षयन्ति। मूलशंकरोऽचिन्तयत् यत् विग्रहोऽयमकिंचित्करः। वस्तुतः देवः प्रतिमायां नास्ति। रात्रिजागरणं विहाय मूलशंकरः गृहं गतः। ततः एव मूलशंकरस्य मूर्तिपूजां प्रति अनास्था जाता। वर्षद्वयाभ्यन्तरे एव तस्य प्रियायाः स्वसुर्निधनं जातम्।

अर्थ – रात्री जागरण के समय मूलशंकर द्वारा देखा गया कि शिव की मूर्ति पर चढ़ाए गए प्रसाद को चूहा खा रहा है। मूलशंकर ने सोचा कि यह मूर्ति कुछ भी करने वाला नहीं है। वास्तव में देवता प्रतिमा में नहीं है। रात्री जागरण छोड़कर मूलशंकर घर चला गया। उसी समय से मूलशंकर के हृदय में मूर्ति पूजा के प्रति आस्था खत्म हो गया। दो वर्ष के अंदर ही उनके प्रिय बहन का निधन हो गया।

 

ततः मूलशंकरे वेराग्यभावः समागतः। गृहं परित्यज्य विभिन्नानां विदुषां सतां साधूनांच संगतौ रममाणोऽसौ मथुरायां विरजानन्दस्य प्रज्ञाचक्षुषः विदुषः समीपमगमत्। तस्मात् आर्षग्रन्थानामध्ययनं प्रारभत।

अर्थ – इसके बाद मूलशंकर में वैराग्य भाव आ गया। घर त्यागकर विभिन्न विद्वानों , सज्जनों और साधुओं की संगति में घूमते हुए वे मथुरा में विरजानन्द नामक अन्धा विद्वान के पास गये। उनसे वैदिक ग्रन्थों का अध्ययन प्रारम्भ कर दिया।

 

विरजानन्दस्य उपदेशात् वैदिकधर्मस्य प्रचारे सत्यस्य प्रचारे च स्वजीवनमसावर्पितवान्। यत्र-तत्र धर्माडम्बराणां खण्डनमपि च चकार। अनेके पण्डिताः तेन पराजिताः तस्य मते च दीक्षिताः।

अर्थ – विरजानन्द के उपदेश से उपदेशित होकर वेदिक धर्म और सत्य के प्रसार में अपने जीवन को समर्पित कर दिया। जहाँ-तहाँ धर्म-आडम्बर का खण्डन भी उन्होने किया। अनेक पंडितों ने उनसे पराजित होकर उनके मत में दीक्षा प्राप्त की।

 

■ स्त्रीशिक्षायाः विधवाविवाहस्य मूर्तिपूजाखण्डनस्य अस्पृश्यतायाः बालविवाहस्य च निवारणस्य तेन महान् प्रयासः विभिनैः समाजोद्धारकैः सह कृतः। स्वसिद्धान्तानां संकलनाय सत्यार्थप्रकाशनामकं ग्रन्थं राष्ट्रभाषायां विरच्य स्वानुयायिनां स महान्तमुपकारं चकार।

अर्थ – स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह, मूर्ति-पूजा खण्डन, छुआ-छूत और बाल-विवाह निवारण का महान प्रयास उनके द्वारा विभिन्न समाज उद्धारको के साथ किया गया। अपने सिद्धांत का संकलन करने के लिए ‘सत्यार्थ प्रकाश‘ नामक ग्रन्थ को हिन्दी भाषा में रचना कर अपने अनुयायी लोगों का बहुत बड़ा उपकार किया।

 

किंच वेदान् प्रति सर्वेषां धर्मानुयायिनां ध्यानमाकर्षयन् स्वयं वेदभाष्याणि संस्कृतहिन्दीभाषयोः रचितवान्। प्राचीनशिक्षायां दोषान् दर्शयित्वा नवीनां शिक्षा पद्धतिमसावदर्शत्। स्वसिद्धान्तानां कार्यान्वयनाय 1875 ईस्वी वर्षे मुम्बईनगरे आर्यसमाजसंस्थायाः स्थापनां कृत्वा अनुयायिनां कृते मूर्त्तरूपेण समाजस्य संशोधनोद्देश्यं प्रकटितवान्।

अर्थ – वेदों के प्रति अनुयायियों का ध्यान आकृष्ट करने के लिए वेद का भाषा संस्कृत-हिन्दी दोनों भाषाओं में लिखा। 18750 में अपने सिद्धांत के प्रचार-प्रसार के लिए मुम्बई में आर्य-समाज की स्थापना करके अनुयायियों के समक्ष उद्देश्य प्रकट किया।

 

सम्प्रति आर्यसमाजस्य शाखाः प्रशाखाश्च देशे विदेशेषु च प्रायेण प्रतिनगरं वर्तन्ते। सर्वत्र समाजदूषणानि शिक्षामलानि च शोधयन्ति। शिक्षापद्धतौ गुरुकुलानां डी॰ ए॰ वी॰ (दयानन्द एंग्लो वैदिक) विद्यालयानांच समूहः स्वामिनो दयानन्दस्य मृत्योः (1883 ईस्वी) अनन्तरं प्रारब्धः तदनूयायिभिः। वर्तमानशिक्षापद्धतौ समाजस्य प्रवर्तने च दयानन्दस्य आर्यसमाजस्य च योगदानं सदा स्मरणीमस्ति।

अर्थ – वर्तमान समय में आर्यसमाज की शाखा-प्रशाखा देश तथा विदेशों के प्रायः सभी नगरों में विद्यमान है। सब जगह समाज में स्थित दोषों और गंदगियों को शुद्ध कर रहा है। शिक्षा पद्धति में गुरूकुलों का डी00 वी0 (दयानन्द-एंग्लो-वैदिक) विद्यालयों का समुह स्वामी दयानन्द की मृत्यु 18830 के बाद अनके अनुयायियों के द्वारा प्रारंभ किया गया।

वर्तमान शिक्षा पद्धति में और समाज के परिवर्त्तन में दयानन्द और आर्य समाज का योगदान सदा स्मरणीय है।

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